एक दिन
एक दिन जब सबेरे सबेरे सुरमई से अंधेर की चादर हटा के एक पर्वत के तकिये से सूरज ने सर जो उठाया तो देखा - दिल की वादी में चाहत का मौसम है और यादों की डालियों पर अनगिनत बीते लमहों की कलियाँ महकने लगीं हैं - अनकही अनसुनी आरज़ू आधी सोई हुई आधी जागी हुई आँखें मलते हुए देखती है - लहर दर लहर मौज दर मौज बहती हुई ज़िन्दगी जैसे हर पल नई और फिर भी वही - हाँ वही ज़िन्दगी जिसके दामन में कोई मोहब्बत भी है कोई हसरत भी है पास आना भी है दूर जाना भी है और ये एहसास है - वक्त झरने सा बहता हुआ जा रहा है ये कहता हुआ - दिल की वादी में चाहत का मौसम है और यादों की डालियों पर अनगिनत बीते लमहों की कलियाँ महकने लगीं हैं
