उवाच

नाम:आशीष कुमार
पता:सूरजपुर, कैलिफोर्निया

बुधवार, जनवरी 19, 2005

एक दिन

एक दिन जब सबेरे सबेरे सुरमई से अंधेर की चादर हटा के एक पर्वत के तकिये से सूरज ने सर जो उठाया तो देखा - दिल की वादी में चाहत का मौसम है और यादों की डालियों पर अनगिनत बीते लमहों की कलियाँ महकने लगीं हैं - अनकही अनसुनी आरज़ू आधी सोई हुई आधी जागी हुई आँखें मलते हुए देखती है - लहर दर लहर मौज दर मौज बहती हुई ज़िन्दगी जैसे हर पल नई और फिर भी वही - हाँ वही ज़िन्दगी जिसके दामन में कोई मोहब्बत भी है कोई हसरत भी है पास आना भी है दूर जाना भी है और ये एहसास है - वक्त झरने सा बहता हुआ जा रहा है ये कहता हुआ - दिल की वादी में चाहत का मौसम है और यादों की डालियों पर अनगिनत बीते लमहों की कलियाँ महकने लगीं हैं

हाँ ठीक है |

देख लिए, काम कर रहा है |